कार्तिक माह की शुक्ल द्वादशी की शाम घर के आँगन में तुलसी के चौरे के सामने दीप जलते हैं, शंख बजता है, परिवार के सभी सदस्य इकट्ठा होते हैं।
उस क्षण जो स्वर वातावरण को पवित्र करता है, वह है Tulsi Vivah Mangalashtak।
यह सिर्फ एक धार्मिक गीत नहीं है। यह सनातन परंपरा का वह सूत्र है जो तुलसी माता और शालिग्राम भगवान के दिव्य विवाह को ब्रह्मांड की समस्त शुभ शक्तियों से जोड़ता है। महाराष्ट्र में Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi के रूप में यह स्तोत्र घर-घर गाया जाता है और जो लोग Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi PDF या Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi Lyrics खोजते हैं, उनके लिए यह ब्लॉग एक संपूर्ण संदर्भ है।
Song Overview गीत का सिंहावलोकन
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| स्तोत्र नाम | Tulsi Vivah Mangalashtak |
| रचना स्रोत | वैदिक-पौराणिक परंपरा (सामूहिक रचना) |
| भाषा | संस्कृत (Hindi, Marathi में प्रयुक्त) |
| प्रकार | मंगलाष्टक 8 श्लोकों वाला आशीर्वाद स्तोत्र |
| अवसर | Tulsi Vivah, हिंदू विवाह संस्कार |
| काल | कार्तिक शुक्ल एकादशी / द्वादशी |
| छंद | शार्दूलविक्रीडित |
| क्षेत्रीय प्रयोग | Hindi, Marathi, Gujarati, Sanskrit क्षेत्र |
| Marathi संस्करण | Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi महाराष्ट्र में अत्यंत प्रचलित |
| PDF उपलब्धता | Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi PDF पूजा-पत्रिकाओं में संकलित |
| प्रत्येक श्लोक की समाप्ति | “कुर्वन्तु वो मंगलम्” |
Mangalashtak क्या होता है?
“Mangalashtak” दो संस्कृत शब्दों से बना है मंगल (शुभ) और अष्टक (आठ श्लोक)।
यह एक परंपरागत stotram शैली है जिसमें ठीक आठ श्लोकों में विभिन्न देवताओं, नदियों, ऋषियों और पवित्र वस्तुओं का आह्वान करके विवाह या किसी मांगलिक कार्य के लिए आशीर्वाद माँगा जाता है।
Tulsi Vivah Mangalashtak विशेष रूप से उस परंपरा के लिए रचा गया है जब तुलसी माता का विवाह शालिग्राम (भगवान विष्णु के पाषाण स्वरूप) से होता है। यह विवाह देवउठनी एकादशी पर होता है और हिंदू विवाह सत्र की शुरुआत का प्रतीक है।
महाराष्ट्र में Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi की परंपरा विशेष रूप से जीवंत है, जहाँ तुलसी विवाह मंगलाष्टक मराठी को विवाह मंडप में पंडित जी द्वारा पाठ किया जाता है और तुलसी विवाह मंगलाष्टक मराठी PDF के रूप में पूजा-पत्रिकाओं में व्यापक रूप से उपलब्ध है।
॥ Tulsi Vivah Mangalashtak संपूर्ण Sanskrit / Hindi Lyrics ॥
॥ अथ मंगलाष्टक मंत्र ॥
ॐ श्रीमत्पंकजविष्टरौ हरिहरौ, वायुर्महेन्द्रोऽनलः।
चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः ।
प्रद्युम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः,
स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥१॥
गंगा गोमति गोपति गणपतिः, गोविन्द गोवर्धनौ,
गीता गोमय गोरजौ गिरिसुता, गंगाधरो गौतमः ।
गायत्री गरुडो गदाधर गया, गम्भीर गोदावरी,
गन्धर्व ग्रह गोप गोकुलधराः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥२॥
नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः, अग्नेश्च पादत्रयं,
तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम् ।
गङ्गावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणं,
संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥३॥
बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासो वसिष्ठो भृगुः,
जाबालि जमदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽङ्गिरा गौतमः ।
मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः,
पुण्यो धर्मसुतो ययातिनहुषौ, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥४॥
गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपर्णाश्च शिवाः,
सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती ।
स्वाहा जाम्बवती च रुक्मिणी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी,
वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥५॥
गङ्गा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नर्मदा,
कावेरी शरयू महेन्द्रतनया, शर्मण्वती वेदिका ।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता गया गण्डकी,
पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥६॥
लक्ष्मीः कौस्तुभ पारिजातक सुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमाः ।
गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः ।
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधेः,
रत्नानीति चतुर्दश प्रतिदिनं, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥७॥
ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूर्यो ग्रहाणां पतिः,
शुक्रो देवपतिः नृलो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः ।
विष्णुर्यज्ञपतिर्यमः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमाः,
इत्येते पतयः सुपर्णसहिताः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥८॥
॥ इति मंगलाष्टक समाप्त ॥
Disclaimer (अस्वीकरण)
Tulsi Vivah Mangalashtak के ये lyrics और अनुवाद सनातन वैदिक परंपरा के सार्वजनिक धार्मिक ग्रंथों से लिए गए हैं। यह सामग्री पूर्णतः शैक्षिक और आध्यात्मिक प्रयोजन के लिए प्रस्तुत है। मूल स्तोत्र की रचना किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि वैदिक-पौराणिक परंपरा की सामूहिक धरोहर है। Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi या Hindi किसी भी संस्करण का श्रवण किसी विश्वसनीय धार्मिक माध्यम से करें और अपने परिवार के पुरोहित के मार्गदर्शन में इसका पाठ करें।
॥ Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi संपूर्ण मराठी लिरिक्स ॥
॥ श्री तुलसी विवाह मंगलाष्टक ॥
॥ अथ मंगलाष्टक मंत्र ॥
स्वस्ति श्री गणनायकं गजमुखं, मोरेश्वरं सिद्धिदं ।
बल्लाळो मुरुडं विनायकमहं, चिन्तामणि स्थेवरं ॥
लेण्याद्रिं गिरिजात्मकं सुरवरदं, विघ्नेश्वरम् ओझरम् ।
ग्रामे रांजण संस्थितम् गणपतिः, कुर्यात् सदा मंगलम् ॥१॥
गंगा सिंधु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नर्मदा ।
कावेरी शरयू महेंद्रतनया, शर्मण्वती वेदिका ।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता गया गण्डकी ।
पूर्णा पूर्णजलैः समुद्रसरिता, कुर्यात् सदा मंगलम् ॥२॥
लक्ष्मीः कौस्तुभ पारिजातक सुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमाः ।
गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः ।
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधेः ।
रत्नानीति चतुर्दश प्रतिदिनं, कुर्यात् सदा मंगलम् ॥३॥
राजा भीष्मक रुक्मिणीस नयनी, देखोनी चिंता करी ।
ही कन्या सगुणा वरा न पवरा, कवणासि देईजे ॥
आता एक विचार कृष्ण नवरा, त्यासी समर्पू म्हणे ।
रुख्मी पुत्र वडील त्यासि पुसणे, कुर्यात् सदा मंगलम् ॥४॥
लक्ष्मी कौस्तुभ पांचजन्य धनु हे, अंगीकारी श्रीहरी ।
रंभा कुंजर पारिजातक सुधा, देवेंद्र हे आवरी ॥
दैत्या प्राप्ती सुरा विधू विष हरा, उच्चैश्रवा भास्करा ।
धनु वैद्य वधू वराशी चवदा, कुर्यात् सदा मंगलम् ॥५॥
गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपर्णाश्च शिवाः ।
सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती ।
स्वाहा जाम्बवती च रुक्मिणी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी ।
वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुर्यात् सदा मंगलम् ॥६॥
आली लग्नघडी समीप नवरा घेऊनि यावा घरा ।
गृह्योत्के मधुपर्कपूजन करा, अन्तःपटाते धारा ॥
दृष्टादृष्ट वधुवरा न करितां, दोघे करावी उभी ।
वाजंत्रे बहु गलबला न करणे, लक्ष्मीपते मंगलम् ॥७॥
ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूर्यो ग्रहाणां पतिः ।
शुक्रो देवपतिः नृलो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः ।
विष्णुर्यज्ञपतिर्यमः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमाः ।
इत्येते पतयः सुपर्णसहिताः, कुर्यात् सदा मंगलम् ॥८॥
॥ इति तुळशी विवाह मंगलाष्टक समाप्त ॥
॥ Tulsi Vivah Mangalashtak English Transliteration ॥
॥ Atha Mangalashtak Mantra ॥
Om Shrimat-pankaja-vishtarau Hari-harau, Vaayu-r-mahendro-analah,
Chandro Bhaskara Vittapaal Varuna, Pratadhipaadigrahah,
Pradyumno Nalakoobarau Suragajah, Chintamanir Kaustubhah,
Swami Shakti-dharashcha Langal-dharah, Kurvantu Vo Mangalam. ॥1॥
Ganga Gomati Gopati Ganapati-h, Govinda Govardhanau,
Gita Gomaya Gorajau Girisuta, Gangaadharo Gautamah,
Gayatri Garudo Gadaadhara Gaya, Gambhira Godavari,
Gandharva Graha Gopa Gokuladharah, Kurvantu Vo Mangalam. ॥2॥
Netraanaam Tritayam Mahat-Pashupateh, Agneshcha Paadatrayam,
Tattad-Vishnu-pada-trayam Tribhuvane, Khyatam Cha Raama-trayam,
Ganga-vaaha-patha-trayam Suvimalam, Veda-trayam Braahmananam,
Sandhyaanaam Tritayam Dvijair-abhimatam, Kurvantu Vo Mangalam. ॥3॥
Vaalmiki-h Sanak-h Sanandana-muni-h, Vyaso Vasishto Bhrighu-h,
Jabaali Jamadagni-r-atri-Janakau, Gargo-Angira Gautamah,
Maandhata Bharato Nripashcha Sagaro, Dhanyo Dilepo Nalah,
Punyo Dharmasuto Yayaati-Nahushau, Kurvantu Vo Mangalam. ॥4॥
Gauri Shri-kula-devata Cha Subhaga, Kadru-Suparnashcha Shivah,
Savitri Cha Saraswati Cha Surabhih, Satyavrata-Arundhati,
Swaha Jambavati Cha Rukmini, Duh-svapna-vidhvamsini,
Vela Chaambu-nidheh Sameena-Makaraa, Kurvantu Vo Mangalam. ॥5॥
Ganga Sindhu Saraswati Cha Yamuna, Godavari Narmada,
Kaveri Sharayu Mahendra-tanaya, Sharmanvati Vedika,
Kshipra Vetravati Mahasura-nadi, Khyata Gaya Gandaki,
Purnah Punya-jalaih Samudra-sahitah, Kurvantu Vo Mangalam. ॥6॥
Lakshmih Kaustubha Parijataka Sura, Dhanvantari-Chandramah,
Gaavah Kaamadughah Sureshvara-Gajo, Rambhadi-Devaanganah,
Ashvah Sapta-mukhah Sudha Haridhanu-h, Shanko Visham Chaambhudheh,
Ratnaaniti Chaturdasha Pratidinam, Kurvantu Vo Mangalam. ॥7॥
Brahma Veda-patih Shivah Pashu-patih, Suryo Grahaanaam Patih,
Shukro Deva-patih Nripo Nara-patih, Skanda-shcha Sena-patih,
Vishnur-Yajna-patir-Yamah Pitru-patih, Taarapatish-Chandramah,
Ityete Patayah Suparna-sahitah, Kurvantu Vo Mangalam. ॥8॥
॥ Iti Mangalashtak Samapt ॥
॥ Tulsi Vivah Mangalashtak श्लोकवार हिंदी अर्थ ॥
श्लोक १ देवों और दिव्य शक्तियों का आह्वान
मूल:
ॐ श्रीमत्पंकजविष्टरौ हरिहरौ, वायुर्महेन्द्रोऽनलः।
चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः ।
प्रद्युम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः,
स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: कमल पर विराजमान भगवान विष्णु और शिव (हरिहर), वायुदेव, इंद्र, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कुबेर, वरुण और समस्त ग्रह-देवता प्रद्युम्न, नलकूबर, देवराज का हाथी ऐरावत, चिंतामणि रत्न, कौस्तुभ मणि, स्वामी कार्तिकेय, शक्ति-धारक और हल-धारक बलराम ये सभी आपका मंगल करें।
श्लोक २ “ग” अक्षर की अनुप्रास माला
मूल:
गंगा गोमति गोपति गणपतिः, गोविन्द गोवर्धनौ,
गीता गोमय गोरजौ गिरिसुता, गंगाधरो गौतमः ।
गायत्री गरुडो गदाधर गया, गम्भीर गोदावरी,
गन्धर्व ग्रह गोप गोकुलधराः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: गंगा, गोमती नदी, गोपों के स्वामी कृष्ण, गणपति, गोविंद, गोवर्धन पर्वत, गीता, गोमय (गोबर पवित्र), गोरज (गाय के खुरों की धूल पवित्र), पार्वती (गिरिसुता), गंगाधर शिव, ऋषि गौतम, गायत्री माता, गरुड़, गदाधर विष्णु, गया तीर्थ, गहरी गोदावरी, गंधर्व, नवग्रह, गोप जन और गोकुल के पालक ये सभी आपका मंगल करें।
काव्य-विशेषता: इस श्लोक का हर शब्द “ग” अक्षर से शुरू होता है। यह अनुप्रास अलंकार (Alliteration) का Sanskrit poetry में दुर्लभ उदाहरण है स्मृति और श्रवण दोनों के लिए आनंददायक।
श्लोक ३ पवित्र त्रिकों की महिमा
मूल:
नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः, अग्नेश्च पादत्रयं,
तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम् ।
गङ्गावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणं,
संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: शिव के तीन नेत्र, अग्नि के तीन पाद, त्रिभुवन-विख्यात विष्णु के तीन पाद (वामन के तीन डग), तीनों राम (श्रीराम, परशुराम, बलराम), गंगा के तीन मार्ग (स्वर्ग-पृथ्वी-पाताल), तीनों वेद (ऋग्, यजुर्, साम), और तीनों संध्याएं (प्रातः, माध्यान्ह, सायं) ये सभी आपका मंगल करें।
श्लोक ४ महान ऋषियों और राजाओं का वरदान
मूल:
बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासो वसिष्ठो भृगुः,
जाबालि जमदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽङ्गिरा गौतमः ।
मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः,
पुण्यो धर्मसुतो ययातिनहुषौ, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: महर्षि वाल्मीकि, सनक, सनंदन, वेद व्यास, वसिष्ठ, भृगु, जाबालि, जमदग्नि, अत्रि, जनक, गर्ग, अंगिरा, गौतम और राजा मांधाता, भरत, सगर, दिलीप, नल, युधिष्ठिर (धर्मसुत), ययाति, नहुष ये सभी ऋषि और धर्मात्मा राजा आपका मंगल करें।
श्लोक ५ स्त्री-शक्तियों और देवियों का आशीर्वाद
मूल:
गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपर्णाश्च शिवाः,
सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती ।
स्वाहा जाम्बवती च रुक्मिणी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी,
वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: गौरी (पार्वती), श्रीलक्ष्मी, कुलदेवी, सुभगा, कद्रू, सुपर्णा, शिवा, सावित्री, सरस्वती, सुरभि (कामधेनु), सत्यव्रता, अरुंधती, स्वाहा (अग्निपत्नी), जांबवती, रुक्मिणी, दुःस्वप्ननाशिनी, समुद्र-तट और जल में विचरने वाले मत्स्य-मकर ये सभी आपका मंगल करें।
विशेषता: यह श्लोक पूरी तरह देवी-शक्तियों को समर्पित है। सनातन परंपरा में स्त्री को सिर्फ पत्नी नहीं, बल्कि शक्ति का स्रोत माना गया है यह श्लोक उसी दर्शन की अभिव्यक्ति है।
श्लोक ६ भारत की पवित्र नदियों का काव्य-नक्शा
मूल:
गङ्गा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नर्मदा,
कावेरी शरयू महेन्द्रतनया, शर्मण्वती वेदिका ।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता गया गण्डकी,
पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: गंगा, सिंधु, सरस्वती, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, सरयू, ताप्ती (महेंद्र-पुत्री), शर्मण्वती, वेदिका, क्षिप्रा, बेतवा, महासुरनदी, गया (फल्गु), गंडकी ये सभी पवित्र नदियाँ और सागर अपने पुण्यजल से परिपूर्ण होकर आपका मंगल करें।
विशेषता: उत्तर से दक्षिण तक की नदियों का एकसाथ आह्वान यह Bharat की भौगोलिक एकता का अध्यात्मिक प्रतिबिंब है। एक श्लोक में पूरा भारत समाया हुआ है।
श्लोक ७ समुद्र मंथन के चौदह रत्न
मूल:
लक्ष्मीः कौस्तुभ पारिजातक सुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमाः ।
गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः ।
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधेः,
रत्नानीति चतुर्दश प्रतिदिनं, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: समुद्र मंथन (Samudra Manthan) के चौदह रत्न लक्ष्मी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, वारुणी, धन्वंतरि, चंद्रमा, कामधेनु, ऐरावत, रंभा आदि अप्सराएं, उच्चैःश्रवा (सात मुख वाला अश्व), अमृत, इंद्रधनुष, शंख और कालकूट विष ये चौदह रत्न प्रतिदिन आपका मंगल करें।
श्लोक ८ समस्त “पतियों” का सामूहिक आशीर्वाद
मूल:
ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूर्यो ग्रहाणां पतिः,
शुक्रो देवपतिः नृलो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः ।
विष्णुर्यज्ञपतिर्यमः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमाः,
इत्येते पतयः सुपर्णसहिताः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥
अर्थ: ब्रह्मा (वेदपति), शिव (पशुपति), सूर्य (ग्रहपति), शुक्राचार्य (देवपति), राजा (नरपति), स्कंद/कार्तिकेय (सेनापति), विष्णु (यज्ञपति), यम (पितृपति), चंद्रमा (तारापति) ये सभी स्वामी गरुड़ सहित आपका मंगल करें।
Tulsi Vivah Mangalashtak की काव्य-शक्ति और आध्यात्मिक महत्व
“Kurvantu Vo Mangalam” एक महामंत्र की तरह
हर श्लोक की अंतिम पंक्ति है “कुर्वन्तु वो मंगलम्” अर्थात “ये सभी तुम्हारा मंगल करें।”
यह सिर्फ एक आशीर्वाद नहीं एक दार्शनिक घोषणा है कि ब्रह्मांड की समस्त शक्तियाँ, चाहे वे देव हों, नदियाँ हों, ऋषि हों या रत्न सभी मिलकर नवदंपती के जीवन को शुभ बनाएं।
Inclusive Philosophy Hari-Hara एकता
श्लोक १ में विष्णु और शिव दोनों को एकसाथ “हरिहरौ” के रूप में बुलाया गया है। Vaishnav और Shaiva दोनों परंपराओं को सम्मान देते हुए यह Tulsi Vivah Mangalashtak सनातन धर्म की समन्वयवादी भावना का प्रतिबिंब है।
Shakti का सम्मान
श्लोक ५ पूरी तरह देवियों और स्त्री-शक्तियों को समर्पित है Gauri, Saraswati, Lakshmi, Arundhati, Rukmini से लेकर समुद्र-तट तक।
Chaturdash Ratna ब्रह्मांड की संपदा
श्लोक ७ में Samudra Manthan के १४ रत्नों का एकसाथ आह्वान यह बताता है कि विवाह कोई साधारण सांसारिक घटना नहीं यह उस cosmic event जितना महत्वपूर्ण है जिसने ब्रह्मांड को उसकी सर्वश्रेष्ठ संपदाएं दीं।
Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi विशेष परंपरा
महाराष्ट्र में Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi की परंपरा पीढ़ियों से जीवंत है। पुणे, नाशिक, कोल्हापुर और नागपुर के परिवारों में तुलसी विवाह मंगलाष्टक मराठी का पाठ विवाह के मंडप में और तुलसी-पूजन में अनिवार्य माना जाता है।
Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi Lyrics का अंतर केवल उच्चारण-शैली में है संस्कृत “ञ्” और “ण्” ध्वनियाँ मराठी में अलग तरह से बोली जाती हैं। मूल अर्थ और भाव हिंदी पाठ जैसा ही है।
Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi PDF उन परिवारों के लिए विशेष उपयोगी है जो विवाह के अवसर पर पंडित जी को पूजा-सामग्री के साथ यह स्तोत्र मुद्रित रूप में देना चाहते हैं।
Tulsi Vivah Mangalashtak का सही पाठ कैसे करें?
समय: देवउठनी एकादशी की शाम या द्वादशी की प्रातःकाल।
विधि:
- तुलसी के चौरे को स्वच्छ करें, दीप जलाएं।
- तुलसी पर जल, रोली, अक्षत, पुष्प अर्पित करें।
- शालिग्राम की मूर्ति रखें।
- परिवार के सभी सदस्यों के साथ Tulsi Vivah Mangalashtak का पाठ करें।
- पाठ के बाद “कुर्वन्तु वो मंगलम्” के साथ आरती करें।
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: Tulsi Vivah Mangalashtak कब पढ़ा जाता है?
कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) या द्वादशी को Tulsi Vivah के अवसर पर। इसके अलावा किसी भी हिंदू विवाह संस्कार में विवाह मंडप में इसका पाठ होता है।
Q2: इस Mangalashtak के छंद का नाम क्या है?
शार्दूलविक्रीडित (Shardulvikridita) संस्कृत का एक दीर्घ और गेय छंद जिसमें प्रति पंक्ति १९ अक्षर होते हैं। इसकी natural rhythm इसे पाठ और कंठस्थ करने में सहज बनाती है।
Q3: Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi Lyrics और Hindi Lyrics में क्या अंतर है?
मूल स्तोत्र संस्कृत में है। Tulsi Vivah Mangalashtak Marathi Lyrics में उच्चारण-शैली मराठी प्रभाव लिए होती है जैसे “ं” (अनुस्वार) का प्रयोग अधिक होता है। अर्थ और भाव दोनों में समान हैं।
Q4: क्या Tulsi Vivah Mangalashtak सिर्फ Tulsi Vivah के लिए है?
नहीं। यह किसी भी हिंदू विवाह में Mangalashtak के रूप में पाठ किया जाता है। गृह प्रवेश, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्यों में भी प्रयोग होता है।
Q5: Mangalashtak में कितने श्लोक होते हैं?
ठीक आठ श्लोक इसीलिए इसे “अष्टक” कहते हैं। Tulsi Vivah Mangalashtak का हर श्लोक “कुर्वन्तु वो मंगलम्” से समाप्त होता है।
Q6: तुलसी विवाह मंगलाष्टक मराठी और Tulsi Vivah Mangalashtak दोनों एक ही हैं?
हाँ। तुलसी विवाह मंगलाष्टक मराठी और Tulsi Vivah Mangalashtak का मूल स्रोत एक ही संस्कृत स्तोत्र है अंतर केवल क्षेत्रीय उच्चारण और लिपि-शैली का है।
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